यदि आपके भीतर सवाल है कि ‘मेरे साथ ही क्यों’, उसके पीछे थकान, हानि, तुलना या अकेलापन हो सकता है।
पहला कदम यह नहीं कि खुद को भाग्यशाली साबित करें। पहला कदम है कहना: अभी सच में कठिन है।
दर्द और बचा हुआ सहारा
कृतज्ञता दर्द मिटाती नहीं। वह बस यह देखने देती है कि सब कुछ नहीं गया।
एक सांस, थोड़ा समय, बैठने की जगह या किसी की देखभाल की स्मृति भी आपको याद दिला सकती है कि यह क्षण पूरी कहानी नहीं है।
‘दूसरों की हालत और खराब है’ कहकर खुद को मत दबाइए। सच्ची कृतज्ञता तुलना नहीं, ध्यान की वापसी है।
तीन छोटे सवाल
- आज कौन सी चीज़ मुझे सहारा दे रही है?
- किसने कभी सच में मेरा भला चाहा?
- यदि बस एक कदम चलना हो, वह क्या होगा?
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कोई खाता नहीं, कोई अभिनय नहीं। बस कुछ कोमल प्रश्न।
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